कर्ट ने एक जार में पानी भरकर उसमें एक जीवित चूहा डाल दिया। पानी में गिरते ही चूहा घबराहट में इधर-उधर तैरने और बाहर निकलने का प्रयास करने लगा। उसने लगातार ज़ोर लगाया, लेकिन कुछ ही मिनटों में उसकी ताकत जवाब दे गई। थकान और निराशा से भरकर उसने प्रयास करना छोड़ दिया और अंततः पानी में डूबकर मर गया।
इसके बाद कर्ट ने अपने प्रयोग में थोड़ा बदलाव किया। उन्होंने एक और जीवित चूहे को पानी से भरे जार में डाला। चूहा पहले की तरह बाहर निकलने के लिए पूरी ताकत से संघर्ष करने लगा। जब वह हार मानने और डूबने ही वाला था, तभी कर्ट ने उसे समय रहते बाहर निकाल लिया। चूहे को सुरक्षित बाहर निकालने के बाद उन्होंने उसे सहलाया, कुछ समय आराम करने दिया और फिर अचानक उसे दोबारा पानी के उसी जार में डाल दिया।
इस बार चूहे में अद्भुत बदलाव देखने को मिले। जहां पहले प्रयास में चूहा मुश्किल से 15–20 मिनट तक संघर्ष कर पाया था, वहीं अब वह बिना हारे लगातार 60 घंटे तक पानी में संघर्ष करता रहा। कर्ट इस नतीजे से हैरान रह गए। उन्होंने इस प्रयोग को "The HOPE Experiment" नाम दिया।
इस शोध का निष्कर्ष यह था कि जब चूहे को पहली बार मौत के मुंह से बचाया गया, तो उसके मन में आशा (Hope) की एक किरण जाग उठी। उसने यह अनुभव कर लिया कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी कोई शक्ति है जो उसे बचा सकती है। इसी उम्मीद और विश्वास ने उसे अगली बार लंबे समय तक संघर्ष करने की ताकत दी।
कर्ट का संदेश स्पष्ट था – आशा जीवन का सबसे बड़ा बल है। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, उम्मीद बनाए रखिए, संघर्ष करते रहिए। सांसें टूटने मत दीजिए, मन को हारने मत दीजिए, क्योंकि मन के हारे हार है और मन के जीते जीत।
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