पतिव्रता सुलोचना: मेघनाद की वीरांगना पत्नी और सतीत्व की अमर गाथा

Sulochana story Ramayana, Sulochana wife of Meghnad, Indrajit wife Sulochana, Meghnad death story, Lakshman vs Meghnad battle, Ramayana tragic love stories, pativrata woman in Ramayana, Sati Sulochana story, Vasuki Naga daughter Sulochana, Ravana daughter in law Sulochana, Indrajit death Ramayana, Ram Lakshman war Lanka, power of pativrata in Hindu mythology, Sulochana devotion story, head of Meghnad story, Hanuman Ram Lakshman mythology, Ramayana lesser known stories, Hindu mythology women devotion, ancient Indian epics stories, Ramayana moral stories, Hindu legends of sacrifice, Sati tradition in epics, Ramayana emotional episodes, Indian mythological love and sacrifice, spiritual stories from Ramayana


सुलोचना नागराज वासुकी की पुत्री और लंका के पराक्रमी योद्धा मेघनाद (इन्द्रजीत) की पत्नी थीं। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयानक और निर्णायक युद्ध में मेघनाद का वध हो गया। जब यह समाचार सुलोचना तक पहुँचा, तो उनका हृदय शोक से विदीर्ण हो उठा। उन्होंने अपने ससुर, लंकापति रावण से प्रार्थना की कि वे श्रीराम के पास जाकर उनके पति का शीश मँगवा दें। किंतु रावण ने यह कहकर इंकार कर दिया कि राम पुरुषोत्तम हैं और उनके पास जाने में किसी प्रकार का भय नहीं होना चाहिए। अतः सुलोचना स्वयं ही जाकर मेघनाद का शीश ले आएँ।

उधर, जब लक्ष्मण रणभूमि में जाने को प्रस्तुत हुए और उन्होंने मेघनाद-वध की प्रतिज्ञा ली, तब श्रीराम ने उन्हें सावधान करते हुए कहा— “लक्ष्मण, मुझे विश्वास है कि तुम अपने शौर्य और रणकौशल से मेघनाद का वध कर दोगे, किंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना। उसका मस्तक किसी भी स्थिति में पृथ्वी पर नहीं गिरना चाहिए। मेघनाद नारी-व्रत का पालन करने वाला है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है। यदि ऐसी साध्वी के पति का मस्तक भूमि पर गिर गया, तो हमारी पूरी सेना का विनाश हो सकता है और विजय की आशा समाप्त हो जाएगी।”

लक्ष्मण ने श्रीराम की आज्ञा का पालन किया। भीषण युद्ध में उन्होंने अपने बाणों से मेघनाद का मस्तक काट दिया, किंतु उसे धरती पर गिरने नहीं दिया। हनुमान वह मस्तक उठाकर श्रीराम के पास ले आए।

युद्धभूमि से कटकर मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई सुलोचना के पास जा गिरी। यह देखकर वह विस्मित रह गईं। अगले ही क्षण उनका हृदय शोक से भर उठा, किंतु उन्होंने उस भुजा को स्पर्श नहीं किया। उनके मन में यह विचार आया कि कहीं यह किसी अन्य पुरुष की भुजा न हो, क्योंकि पर-पुरुष का स्पर्श उनके पतिव्रत को कलंकित कर सकता था।

सत्य जानने के लिए उन्होंने उस भुजा से कहा— “यदि तुम मेरे स्वामी की भुजा हो, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का संपूर्ण वृत्तांत लिखकर प्रकट करो।” दासी ने लेखनी भुजा के पास रख दी और वह भुजा लिखने लगी— “प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है। युद्धभूमि में मेरा सामना श्रीराम के भाई लक्ष्मण से हुआ। वे वर्षों से अन्न, निद्रा और पत्नी का त्याग किए हुए तेजस्वी योद्धा हैं। संग्राम में मैं उनसे पराजित हो गया और उनके बाणों से मेरा प्राणांत हुआ। मेरा शीश इस समय श्रीराम के पास है।”

यह पढ़ते ही सुलोचना शोक से व्याकुल हो उठीं। उनके विलाप को सुनकर रावण वहाँ पहुँचे और बोले— “पुत्री, शोक मत करो। प्रातःकाल मैं अपने बाणों से सहस्त्रों मस्तक काटकर पृथ्वी पर गिरा दूँगा।” इस पर सुलोचना करुण स्वर में बोलीं— “पिताजी, इससे मेरा क्या लाभ? सहस्त्रों नहीं, करोड़ों मस्तक भी मेरे स्वामी के अभाव की पूर्ति नहीं कर सकते।”

तब सुलोचना ने सती होने का निश्चय किया। किंतु उनके पति का शव तो राम-दल में था। उन्होंने रावण से अनुरोध किया कि उनके पति का शव मँगवा दिया जाए। रावण ने उत्तर दिया— “देवी, तुम स्वयं राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जहाँ बालब्रह्मचारी हनुमान, जितेन्द्रिय लक्ष्मण और एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम उपस्थित हों, वहाँ जाने में कोई भय नहीं होना चाहिए। मुझे विश्वास है कि तुम निराश नहीं लौटोगी।”

सुलोचना के आगमन का समाचार सुनते ही श्रीराम उठ खड़े हुए और स्वयं उनके पास जाकर बोले— “देवी, तुम्हारे पति महान योद्धा और असाधारण पराक्रमी थे। किंतु विधि का विधान कोई नहीं टाल सकता। आज तुम्हें इस अवस्था में देखकर मुझे गहन पीड़ा हो रही है।”

सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगीं, किंतु श्रीराम ने उन्हें रोकते हुए कहा— “देवी, मुझे लज्जित मत करो। पतिव्रता की महिमा अपार होती है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। अपने यहाँ आने का कारण बताओ, ताकि मैं तुम्हारी सहायता कर सकूँ।”

आँसुओं से भरी आँखों से सुलोचना ने कहा— “राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिए अपने पति का मस्तक लेने आई हूँ।” श्रीराम ने तत्काल सम्मानपूर्वक मेघनाद का शीश मँगवाकर उन्हें सौंप दिया।

पति का छिन्न मस्तक देखते ही सुलोचना का हृदय द्रवित हो उठा। रोते हुए उन्होंने लक्ष्मण से कहा— “सुमित्रानंदन, यह अहंकार मत करना कि मेघनाद का वध तुमने किया। उसे पराजित करने की शक्ति संसार में किसी में नहीं थी। यह दो पतिव्रता नारियों का संयोग था— आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी। मेरे पति ने अपने पिता के अन्न का पालन किया और उन्हीं के लिए युद्ध में उतरे, इसी कारण वे इस लोक से चले गए।”

राम-शिविर में उपस्थित सभी योद्धा यह देखकर आश्चर्यचकित थे कि सुलोचना को यह कैसे ज्ञात हुआ कि मेघनाद का शीश श्रीराम के पास है। सुग्रीव के पूछने पर सुलोचना ने स्पष्ट कहा— “मेरे पति की भुजा युद्धभूमि से उड़कर मेरे पास आई थी और उसी ने यह सब लिखकर बताया।”

व्यंग्य करते हुए सुग्रीव बोले— “यदि निर्जीव भुजा लिख सकती है, तो यह कटा हुआ सिर भी हँस सकता है।” श्रीराम ने गंभीर स्वर में कहा— “मित्र, पतिव्रता की शक्ति को मत आँको। यदि वह चाहे, तो यह कटा हुआ सिर भी हँस सकता है।”

सुलोचना ने कहा— “यदि मैंने मन, वचन और कर्म से अपने पति को देवता माना है, तो यह मस्तक हँसे।” इतना कहते ही मेघनाद का कटा हुआ मस्तक जोर से हँस पड़ा। यह दृश्य देखकर सभी स्तब्ध रह गए और पतिव्रता सुलोचना को नमन किया।

प्रस्थान करते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की— “भगवन, आज मेरे पति का अंतिम संस्कार है और मैं उनके साथ जाने वाली हूँ। अतः आज युद्ध स्थगित रखा जाए।” श्रीराम ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

सुलोचना मेघनाद का शीश लेकर लंका लौट आईं। समुद्र तट पर चंदन की चिता सजाई गई। पति का शीश गोद में रखकर सुलोचना चिता पर बैठीं और कुछ ही क्षणों में अग्नि की लपटों में समर्पित होकर सती हो गईं।
पतिव्रता की यह महिमा युगों तक स्मरण की जाती रही।

Post a Comment

0 Comments