साधारण दृष्टि से देखें तो ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यह घटना कहीं अरब सागर में घटी होगी, लेकिन वास्तविकता इससे भिन्न है। किसी भी ऐतिहासिक या पौराणिक घटना के सही स्थान को समझने के लिए उस समय की भौगोलिक परिस्थितियों को जानना आवश्यक होता है। यदि हम ग्रंथों का गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता है कि समुद्र मंथन के काल में बिहार, बंगाल, झारखंड और उड़ीसा जैसे क्षेत्र जलमग्न थे। उस समय उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग भी अस्तित्व में नहीं था।
समुद्र मंथन की कथा भागीरथी के प्रादुर्भाव से भी बहुत पहले की है। उस युग में हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बहुत कम भूमि का निर्माण कर पाई थीं। वास्तव में भूमि का निर्माण नदियों द्वारा ही होता है। यदि पर्वत इस राष्ट्र के पिता हैं, तो नदियाँ इसकी माताएँ हैं। आज भी सुंदरवन का विशाल डेल्टा इस प्राकृतिक प्रक्रिया का जीवंत प्रमाण है।
कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन का निर्णय हुआ तो मंदार पर्वत को मथानी बनाया गया और कूर्मावतार ने उसे आधार प्रदान किया। किंतु समस्या यह थी कि मथानी को घुमाने के लिए रस्सी कहाँ से लाई जाए। तब सर्वसम्मति से यह निश्चय हुआ कि हिमालय की कंदराओं में विश्राम कर रहे नागराज वासुकि से यह कार्य कराया जाए, क्योंकि उनसे बड़ी और सशक्त रस्सी जैसी कोई वस्तु तीनों लोकों और चौदहों भुवनों में नहीं थी।
अब प्रश्न यह था कि इतने विशाल नागराज को लाए कौन। वे इतने बड़े थे कि रेंगते समय भी टकराने लगते थे, इसलिए अधिकांश समय विश्राम ही करते थे। तब कैलाशपति भगवान शिव उठे और वासुकि को अपनी कलाई में लपेटकर स्वयं उन्हें मंथन स्थल तक ले आए। नागराज को वहाँ पहुँचाकर भोलेनाथ एक स्थान पर बैठ गए।
मंथन प्रारंभ होते ही नागराज वासुकि को अत्यधिक पीड़ा होने लगी। एक ओर देवता खींचते थे, दूसरी ओर असुर, और बीच में मंदार पर्वत की चुभन थी। पीड़ा से व्याकुल होकर वासुकि फुफकारने लगे। कल्पना कीजिए, जिस नाग को एक पूरे पर्वत के चारों ओर लपेट दिया गया हो, वह कितना विशाल होगा। उनके फुफकारने से विष समस्त सृष्टि में फैलने लगा और चारों ओर हाहाकार मच गया।
स्थिति इतनी भयावह हो गई कि देवता और असुर सब कुछ छोड़कर भाग खड़े हुए, जबकि नागराज वासुकि वहीं निढाल अवस्था में पड़े रहे।
अब समस्या यह थी कि इस प्रलयंकारी हलाहल विष का क्या किया जाए।
देवताओं की सभा हुई और प्रश्न उठा कि इस विष का पान कौन करेगा। तब भगवान विष्णु ने भगवान शिव से विनती की कि हे भोलेनाथ, केवल आप ही इसे पी सकते हैं। सच ही है, जो भोले होते हैं, विष भी उन्हीं के हिस्से आता है।
भगवान शिव ने आगे बढ़कर हलाहल विष का पान किया और फिर नागराज वासुकि का उपचार किया। यह सब धन्वंतरि के प्रकट होने से भी पहले हुआ। वैद्यनाथ तो धन्वंतरि से भी प्राचीन वैद्य माने जाते हैं।
विषपान के बाद उसका ताप असहनीय हो गया, इसलिए भगवान शिव वहीं एक स्थान पर बैठ गए। उसी समय मंथन पुनः आरंभ हुआ। मंथन से निकले चंद्रमा के एक अंश को लेकर भगवान शिव ने उसे अपने मस्तक पर धारण किया। उस चंद्रखंड से निरंतर शीतल जल उनके मस्तक पर गिरता रहता है, जिससे विष का प्रभाव शांत होता है।
अब प्रश्न उठता है कि वह स्थान कहाँ है जहाँ समुद्र मंथन हुआ था।
मान्यता के अनुसार, बिहार के बाँका जिले में स्थित मंदार पर्वत और उसके आसपास का क्षेत्र ही समुद्र मंथन का स्थान है। आज भी झारखंड, बंगाल, उड़ीसा और बिहार की भूमि में प्रचुर मात्रा में खनिज पाए जाते हैं, जिनका केंद्र मंदार पर्वत ही माना जाता है। यह विश्वास है कि समुद्र मंथन से निकली अनेक निधियाँ आज भी मंदार क्षेत्र में छिपी हुई हैं।
भगवान शिव ने नागराज वासुकि को पहुँचाने के बाद जिस स्थान पर विश्राम किया, वह आज वासुकीनाथ के नाम से जाना जाता है। जहाँ उन्होंने विषपान के बाद वासुकि का उपचार किया और स्वयं विराजमान हुए, वही स्थान वैद्यनाथ धाम, देवघर कहलाता है। भगवान शिव के मस्तक पर स्थापित चंद्रमा का वह अंश आज भी वहीं है, जिससे निरंतर जल टपकता रहता है।
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