मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स के आने के बाद सुपरहीरो फिल्मों की लोकप्रियता पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ी, लेकिन यह सच अक्सर भुला दिया जाता है कि भारत, खासकर बॉलीवुड, इस जॉनर से पहले भी प्रयोग कर चुका था। भले ही उन फिल्मों का स्केल, तकनीक और मार्केटिंग आज के स्तर की न रही हो, लेकिन कल्पना, साहस और प्रयोग के मामले में वे अपने समय से काफी आगे थीं। “Bollywood Superhero Movies Before the Marvel Era” आज इसलिए ट्रेंड कर रहा है क्योंकि दर्शक अब पीछे मुड़कर देख रहे हैं कि भारतीय सिनेमा ने सुपरहीरो की अवधारणा को कितनी जल्दी अपनाने की कोशिश की थी।
बॉलीवुड में सुपरहीरो का विचार सीधे कॉमिक बुक स्टाइल में नहीं आया, बल्कि लोककथाओं, पौराणिक पात्रों और फैंटेसी से विकसित हुआ। शुरुआती हिंदी फिल्मों में नायक अक्सर असाधारण शक्तियों वाला, अन्याय के खिलाफ खड़ा होने वाला और आम लोगों का रक्षक होता था। यही गुण बाद में सुपरहीरो की परिभाषा बने। 80 और 90 के दशक में जब हॉलीवुड में सुपरमैन और बैटमैन लोकप्रिय हो रहे थे, तब बॉलीवुड भी अपनी शैली में ऐसे किरदार गढ़ने की कोशिश कर रहा था।
1991 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘अजूबा’ इस दिशा में एक सबसे साहसी प्रयास मानी जाती है। अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया गया नकाबपोश किरदार बहारिस्तान नाम के काल्पनिक राज्य में अत्याचार के खिलाफ लड़ता है। शशि कपूर द्वारा प्रोड्यूस और इंडियन–रशियन कोलैबोरेशन में बनी इस फिल्म ने भव्य सेट्स, फैंटेसी वर्ल्ड और सुपरहीरो स्वैग को भारतीय पर्दे पर उतारने की कोशिश की। भले ही यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, लेकिन आज इसे एक कल्ट फैंटेसी फिल्म के रूप में याद किया जाता है।
‘अजूबा’ से पहले भी हिंदी सिनेमा में सुपरपावर और फैंटेसी के तत्व दिख चुके थे। 1987 की फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ को अक्सर भारत की पहली मॉडर्न सुपरहीरो फिल्म कहा जाता है। अनिल कपूर का अदृश्य हो जाने वाला किरदार बच्चों और बड़ों दोनों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। फिल्म में सुपरपावर के साथ-साथ भावनाएं, कॉमेडी और सामाजिक संदेश भी था, जिसने इसे आज तक यादगार बनाए रखा। मोगैम्बो जैसे विलेन ने यह साबित किया कि एक मजबूत खलनायक सुपरहीरो कहानी को और प्रभावशाली बना सकता है।
90 के दशक के अंत और 2000 की शुरुआत में ‘शक्तिमान’ जैसे टीवी शोज़ ने भी सुपरहीरो को घर-घर तक पहुंचाया। हालांकि यह एक टीवी सीरीज़ थी, लेकिन इसका प्रभाव फिल्मों से कम नहीं था। बच्चों के बीच शक्तिमान एक आइकन बन गया और इसने यह साबित किया कि भारतीय दर्शक देसी सुपरहीरो को अपनाने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कहानी उनसे जुड़ सके।
2003 में रिलीज़ हुई ‘कोई… मिल गया’ ने सुपरहीरो जॉनर को एक नया मोड़ दिया। भले ही यह फिल्म सीधे सुपरहीरो की न हो, लेकिन रोहित के किरदार में दिखी असाधारण शक्तियां और एलियन जादू ने आगे चलकर ‘कृष’ फ्रेंचाइज़ी की नींव रखी। 2006 में आई ‘कृष’ को भारत की पहली सफल सुपरहीरो फ्रेंचाइज़ी माना जाता है। यह सब उस आधार पर खड़ा था, जो ‘अजूबा’ और ‘मिस्टर इंडिया’ जैसी फिल्मों ने पहले ही तैयार कर दिया था।
मार्वल से पहले बनी इन बॉलीवुड सुपरहीरो फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे सिर्फ एक्शन या ताकत पर केंद्रित नहीं थीं। उनमें भावनाएं, परिवार, समाज और नैतिक मूल्यों को भी महत्व दिया जाता था। नायक सिर्फ दुश्मनों से नहीं लड़ता था, बल्कि अपने डर, कमजोरियों और सामाजिक जिम्मेदारियों से भी जूझता था। यही वजह है कि तकनीकी कमियों के बावजूद ये फिल्में यादगार बनी रहीं।
आज जब दर्शक मार्वल और डीसी की फिल्मों के आदी हो चुके हैं, तब बॉलीवुड की पुरानी सुपरहीरो फिल्मों को नए नजरिए से देखा जा रहा है। सोशल मीडिया, यूट्यूब और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर इन फिल्मों की क्लिप्स और रिव्यू वायरल हो रहे हैं। लोग यह समझने लगे हैं कि सीमित संसाधनों के बावजूद भारतीय फिल्ममेकर्स ने कल्पना की उड़ान भरने की कोशिश की थी।
ये फिल्में भले ही अपने समय में पूरी तरह सफल न रही हों, लेकिन इन्होंने भविष्य की सुपरहीरो कहानियों के लिए रास्ता जरूर तैयार किया। आज की बड़ी बजट वाली फिल्मों के पीछे कहीं न कहीं इन्हीं शुरुआती प्रयासों की छाया दिखाई देती है।
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