मातृत्व और कर्म का भयावह चक्र

 

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मादा बिच्छू की मृत्यु की कथा अत्यंत पीड़ादायक और विचलित कर देने वाली मानी जाती है। कहा जाता है कि प्रकृति के इस कठोर विधान में जीवन का आरंभ ही मृत्यु के भयावह रूप से जुड़ा होता है। चित्र में दर्शाई गई मादा बिच्छू की पीठ पर दिखाई देने वाले छोटे-छोटे जीव उसके ही बच्चे हैं। जन्म लेते ही ये सभी बच्चे अपनी माँ की पीठ पर चढ़ जाते हैं। सामान्यतः इसे मातृत्व का प्रतीक समझा जाता है, किंतु इस प्राणी के जीवन में यही मातृत्व उसकी असहनीय पीड़ा का कारण बन जाता है।

ऐसी मान्यता है कि ये बच्चे अपनी भूख शांत करने के लिए जन्म के तुरंत बाद ही अपनी ही माँ के शरीर को भोजन के रूप में ग्रहण करना प्रारंभ कर देते हैं। वे धीरे-धीरे उसके शरीर को कुतरते रहते हैं और यह प्रक्रिया किसी एक क्षण में समाप्त नहीं होती। मादा बिच्छू तड़पती है, कराहती है, पीड़ा से छटपटाती रहती है, किंतु उसके बच्चे उसे छोड़ते नहीं। वे उसे तुरंत मृत्यु नहीं देते, बल्कि कई दिनों तक उसे ऐसी यातना से गुजरना पड़ता है जो मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक कही जाती है। अंततः जब उसका शरीर पूरी तरह क्षीण हो जाता है और केवल अस्थियां शेष रह जाती हैं, तब कहीं जाकर वह प्राण त्यागती है। माँ की मृत्यु के पश्चात ही उसके बच्चे उसकी पीठ से नीचे उतरते हैं और अपना स्वतंत्र जीवन आरंभ करते हैं।

इस दृश्य को देखकर मनुष्य सहज ही सिहर उठता है और जीवन के रहस्यों पर विचार करने को विवश हो जाता है। लख चौरासी के इस अनंत चक्र में ऐसी असंख्य योनियाँ बताई गई हैं, जिनकी पीड़ाओं और परिस्थितियों का मनुष्य अनुमान भी नहीं लगा सकता। शायद इसी कारण संसार को भवसागर कहा गया है—अगम, अथाह और रहस्यमय। प्रत्येक योनि अपने भीतर सुख और दुःख का ऐसा संगम समेटे हुए है, जिसे समझ पाना सामान्य बुद्धि के लिए कठिन है।

ऋषियों और मनीषियों के मतानुसार, यह सब मनुष्य योनि में किए गए कर्मों का ही प्रतिफल है। मनुष्य अपने जीवन में जैसे कर्म करता है, उन्हीं कर्मों के आधार पर उसे विभिन्न योनियों में जन्म लेकर सुख और दुःख भोगने पड़ते हैं। कोई कर्म उसे शांति और आनंद की ओर ले जाते हैं, तो कुछ उसे असहनीय पीड़ा और यातना की ओर ढकेल देते हैं। यह कर्म-सिद्धांत अटल माना गया है—जिससे कोई भी जीव बच नहीं सकता।

इसी गूढ़ सत्य को संत कबीर ने अपने दोहे में अत्यंत सरल किंतु मार्मिक रूप में व्यक्त किया है—

“चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय,
दोय पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।”

यह दोहा जीवन की उस चक्की की ओर संकेत करता है, जिसमें प्रत्येक प्राणी पिस रहा है। समय, कर्म और परिस्थितियों के दो पाटों के बीच शायद ही कोई ऐसा हो, जो पूरी तरह सुरक्षित बच सके। मादा बिच्छू की यह कथा भी उसी कटु सत्य की प्रतीक है, जो हमें अपने कर्मों के प्रति सजग और जीवन के प्रति विनम्र होने की शिक्षा देती है।

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