इकलौता बेटा भारी मन और बोझिल कदमों के साथ अपने पिता को वृद्धाश्रम में छोड़कर लौट रहा था। जीवन की सबसे कठिन घड़ी वही होती है, जब अपने ही हाथों से किसी अपने को स्वयं से दूर किया जाए। पिता की आँखों में मौन था—न कोई शिकायत, न कोई सवाल—बस एक गहरी चुप्पी, जो बेटे के हृदय को भीतर ही भीतर कचोट रही थी।
वह गेट से बाहर निकला ही था कि अचानक मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर पत्नी का नाम चमक रहा था। उसने फोन उठाया। उधर से पत्नी की आवाज़ आई—सख़्त, निर्णायक और बिना किसी हिचक के।
“एक बार फिर वृद्धाश्रम लौट जाओ। एक ज़रूरी बात कहना भूल गई हूँ। वहाँ जाकर अपने पिता को साफ़-साफ़ समझा देना कि चाहे कोई पूजा-पर्व हो, कोई त्योहार हो या यहाँ तक कि तुम्हारा जन्मदिन ही क्यों न हो—तुम्हारे पिता उसी वृद्धाश्रम में रहेंगे। हमारे घर नहीं आएँगे।”
फोन कट गया, लेकिन उसके शब्द बेटे के कानों में हथौड़े की तरह बजते रहे। दिल ने विरोध किया, पर परिस्थितियों और पत्नी के दबाव के आगे वह स्वयं को असहाय महसूस कर रहा था। भारी मन से वह वापस वृद्धाश्रम की ओर मुड़ गया।
वृद्धाश्रम में प्रवेश करते ही उसने जो दृश्य देखा, वह अप्रत्याशित था। उसका बूढ़ा पिता वहाँ के बुज़ुर्ग मालिक के साथ बैठा था और दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए बातें कर रहे थे। पिता के चेहरे पर वही मुस्कान थी, जो कभी बेटे के बचपन में हुआ करती थी—निष्कलुष, सच्ची और आत्मीय।
यह देखकर बेटे के मन में संदेह उत्पन्न हुआ। उसने सोचा—“क्या पिताजी इस वृद्धाश्रम के मालिक को पहले से जानते हैं? या फिर यह केवल औपचारिक बातचीत है?”
वह थोड़ी दूरी पर खड़ा होकर प्रतीक्षा करने लगा। कुछ देर बाद उसके पिता अपने निर्धारित कमरे में चले गए। तब बेटा वृद्धाश्रम के मालिक के पास पहुँचा और संकोच भरे स्वर में बोला—
“सर, एक बात पूछूँ? अभी आप मेरे पिता से जिस तरह खुलकर और अपनत्व से बातें कर रहे थे, उससे लगा कि आप दोनों पहले से परिचित हैं। क्या ऐसा सच में है?”
वृद्धाश्रम के मालिक ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“हाँ, मैं इन्हें लगभग चालीस वर्षों से जानता हूँ। किन परिस्थितियों में ये आज यहाँ आए, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि आपके पिता दिल से बहुत महान इंसान हैं।”
बेटा चौंक गया। उसके भीतर उत्सुकता और बेचैनी दोनों बढ़ गईं। उसने पूछा—
“पर आप इन्हें चालीस सालों से कैसे जानते हैं, सर?”
वृद्ध मालिक की आँखें कुछ क्षणों के लिए अतीत में खो गईं। वे बोले—
“चालीस साल पहले मेरे अधीन एक अनाथालय हुआ करता था। उसी अनाथालय से आपके पिता ने एक छोटे से अनाथ बच्चे को गोद लिया था। वह बच्चा बेसहारा था, लेकिन आपके पिता ने उसे अपना नाम, अपना घर और अपना जीवन दे दिया। और यदि मेरा अनुमान गलत नहीं है, तो वह अनाथ बच्चा आज मेरे सामने खड़ा है।”
यह सुनते ही जैसे ज़मीन उसके पैरों तले खिसक गई। बेटे की आँखों के सामने अतीत के सारे दृश्य एक-एक करके उभर आए—बचपन की यादें, पिता का संघर्ष, उनका त्याग, उनकी रातों की जागरण और दिन की मेहनत।
वह समझ गया था—वह अनाथ बच्चा वही स्वयं था।
उसकी आँखों से आँसू झर-झर बहने लगे। वर्षों से दबा हुआ अपराधबोध अचानक फूट पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगा। बिना एक पल गँवाए वह दौड़ता हुआ अपने पिता के कमरे में पहुँचा और उनके पैरों से लिपट गया।
सिसकते हुए वह बोला—
“मुझे माफ कर दीजिए, पिताजी… मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। दो दिनों के मोह और स्वार्थ के लिए मैंने आपके चालीस साल के प्रेम, त्याग और बलिदान को भुला दिया।”
बेटे की यह दशा देखकर पिता की आँखें भी भर आईं। उन्होंने काँपते हाथों से बेटे को उठाया, अपने सीने से लगा लिया और स्नेह भरे स्वर में बोले—
“अरे मूर्ख बेटे, इसके लिए रोने की क्या ज़रूरत है? पिता के दिल में बच्चे के लिए कभी कोई शिकायत होती है क्या? मैंने तो तुम्हें उसी दिन माफ कर दिया था।”
उन शब्दों में कोई कटुता नहीं थी—बस असीम प्रेम और क्षमा थी।
बेटे ने अपने आँसू पोंछे, पिता का हाथ थामा और दृढ़ निश्चय के साथ बोला—
“अब नहीं, पिताजी। अब आप मेरे साथ घर चलेंगे। जहाँ आपने मुझे जीवन दिया, वहीं अब मैं आपका सहारा बनूँगा।”
वह अपने पिता को वृद्धाश्रम से लेकर घर की ओर चल पड़ा—एक नई शुरुआत के साथ।
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