आंगन में आज हलचल थी। पंचायत की चौपाल सजी हुई थी, गांव के बुजुर्ग, पड़ोसी और कुछ रिश्तेदार भी जमा थे। माहौल में एक अजीब-सी गंभीरता थी। कृपाशंकर जी के दोनों बेटे—गिरीश और कुनाल—इत्मीनान से अपनी-अपनी जगह खड़े थे, जैसे कोई बहुत बड़ा फैसला आज होना हो। तभी बड़ा बेटा गिरीश आगे बढ़ा और रूखे स्वर में बोला—
“पापा जी! पंचायत इकट्ठी हो गई है, अब बंटवारा कर दो।”
उसके स्वर में ना आदर था, ना अपनापन—बस एक मांग थी, जैसे कोई देनदार अपने हक की वसूली करने आया हो। गिरीश की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि छोटा बेटा कुनाल भी उसी तीखे अंदाज में बोल पड़ा—
“हाँ पापा जी, अब इकट्ठे नहीं रहा जाता। कर दो बंटवारा।”
सारी पंचायत सन्न थी। किसी को उम्मीद न थी कि दोनों बेटे अपने पिता से इस तरह बात करेंगे। लेकिन इस दौर में ऐसे दृश्य आम होने लगे थे—माता-पिता बूढ़े होने लगते हैं और बच्चे अपने लिए अलग छत का इंतजाम सोचने लगते हैं, जैसे जिम्मेदारियों का बोझ उन्हीं पर आ गिरा हो।
कृपाशंकर जी धीरे-धीरे चौपाल में आए। उनका चेहरा शांत था, लेकिन आंखों में गहरी उदासी तैर रही थी। सरपंच ने आगे बढ़कर उनके कंधे पर हाथ रखा और धीमे स्वर में पूछा—
“कृपाशंकर, जब साथ में निर्वाह न हो, तो बच्चों को अलग कर देना ठीक है। लेकिन पहले यह बता, तू अब किस बेटे के साथ रहेगा?”
यह सवाल सरल था, लेकिन जवाब बेहद कठिन। यह उन पिता से पूछा जा रहा था जिन्होंने पूरी जिंदगी बच्चों को जोड़कर रखा था—अब वही पिता यह तय करे कि वह किसका हिस्सा बनें?
कृपाशंकर जी चुप थे। उनका मन वर्षों पीछे चला गया था—वो दिन याद आ रहे थे जब गिरीश और कुनाल की किलकारियों के बिना रहना उनके लिए असंभव था। वह दोनों उनकी उंगली पकड़कर चलने वाले बच्चे थे। उनकी नींद, उनके खेल, उनका रोना—सब कुछ उनका अपना जीवन था। आज वही बच्चे बड़े हो गए थे और पिता को अपनी सुविधा के अनुसार बांट देना चाहते थे।
अचानक गिरीश की आवाज से उनकी तंद्रा टूटी।
“इसमें क्या पूछना? छ: महीने पापा जी मेरे साथ रहेंगे और छ: महीने छोटे के पास।”
कितना आसान था उसके लिए यह कहना—जैसे पिता नहीं, कोई बक्सा हो जिसे दो हिस्सों में बांट कर रख दिया जाए।
सरपंच ने बात संभालते हुए कहा—
“चलो, पिता के रहने का फैसला हो गया। अब जायदाद का बंटवारा कर लेते हैं।”
इतना सुनते ही कृपाशंकर जी, जो अब तक सिर झुकाकर बैठे थे, अचानक उठ खड़े हुए। उनकी आंखों में वह आंसू नहीं थे जो लोग बूढ़े व्यक्तियों में देखने की उम्मीद करते हैं—बल्कि उनमें गुस्से और आत्मसम्मान की चमक थी।
“अब मैं फैसला करूंगा। और मेरा फैसला यह है कि इन दोनों को घर से बाहर निकाल दिया जाए!”
चौपाल में सन्नाटा छा गया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि वे इस तरह गरजेंगे। दोनों बेटे आवाक थे। कृपाशंकर जी ने आगे कहा—
“सुन सरपंच, इनसे कहो—यह चुपचाप घर से निकल जाएं। जमीन-जायदाद में हिस्सा चाहिए तो छ: महीने आकर मेरे पास रहें, और बाकी छ: महीने कहीं और इंतजाम करें। फिर अगर मेरा मूड बना तो सोचूंगा कि इन्हें क्या देना है।”
फिर उन्होंने दोनों बेटों को देखा—उनकी आंखों में वर्षों की उपेक्षा और आज का दर्द था।
“जायदाद का मालिक मैं हूं, ये सब नहीं।”
उन्हें उम्मीद नहीं थी कि पापा जी इस तरह फैसला सुनाएंगे। उन्हें लगता था पिता हमेशा की तरह भावुक हो जाएंगे, कुछ बोलेंगे नहीं, और सब कुछ उनके नाम कर देंगे। पर आज पिता ने उन्हें बता दिया कि सहनशीलता को कमजोरी न समझा जाए।
सारी पंचायत भी चकित थी। गांव के बूढ़े लोग धीरे-धीरे सिर हिलाते हुए कहने लगे—
“यही तो जरूरत है आजकल—नया समय है, नई सोच चाहिए।”
कृपाशंकर जी चुपचाप चौपाल से बाहर निकले। आज उनके कदम धीमे नहीं बल्कि मजबूत थे। दोनों बेटे वहीं खड़े थे—लज्जित, स्तब्ध और पश्चाताप से भरे।
आज उन्होंने समझ लिया था कि बंटवारा सिर्फ मकान, जमीन या संपत्ति का नहीं होता—कभी-कभी बंटवारा करने की इच्छा ही अपने घर की आत्मा को चोट पहुंचा देती है।
और गांव में चर्चा शुरू हो गई—
“इस बार पंचायत में सही बंटवारा हुआ है—जायदाद का नहीं, सोच का।”
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