काशी के श्मशान घाट: वो पांच शव जिन्हें नहीं दी जाती अग्नि | Kashi Moksha Secrets

 

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कहते हैं कि काशी यानी वाराणसी सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक आस्था है, एक विश्वास है और जीवन-मरण के रहस्यों को समेटे एक अद्भुत तीर्थ है। यहां आने वाला हर यात्री किसी न किसी रूप में खुद को भगवान शिव की शरण में पाता है। काशी के बारे में मान्यता है कि यदि किसी की मृत्यु यहां हो जाए या उसका अंतिम संस्कार यहां किया जाए, तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है। आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाती है और परम शांति को प्राप्त करती है। यही कारण है कि जीवन के अंतिम पड़ाव में बहुत से लोग काशी आकर बस जाते हैं और यहीं पर सांसारिक जीवन को त्याग देते हैं।

काशी के घाट जीवन और मृत्यु दोनों का संगम माने जाते हैं। सुबह सूरज की पहली किरण जब गंगा के जल पर पड़ती है, तो घाट पर स्नान करते श्रद्धालु और साधु-संत अध्यात्म की अनुभूति कराते हैं। और रात होते-होते वही घाट मृत्यु के अनंत सत्य का साक्षी बन जाते हैं। यहां चिताएं 24 घंटे जलती रहती हैं। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि यहां की चिता कभी ठंडी नहीं होती, क्योंकि जीवन और मृत्यु का यह चक्र निरंतर चलता रहता है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि काशी में हर शव का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता? हां, बिल्कुल सही पढ़ा आपने। यहां पांच तरह के शव ऐसे हैं, जिन्हें श्मशान घाट पर अग्नि नहीं दी जाती। इनके लिए अलग-अलग धार्मिक और वैज्ञानिक कारण बताए जाते हैं।

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक नाविक श्रद्धालुओं को गंगा के बीचोंबीच खड़ा होकर बता रहा है कि किन शवों को काशी में जलाने की अनुमति नहीं है। यह वीडियो लोगों में जिज्ञासा और चर्चा का विषय बन गया। तो आइए जानते हैं वे पांच शव कौन-से हैं, जिन्हें काशी की धरती पर अग्नि नहीं दी जाती।


1. सांप के काटने से मृत्यु

अगर किसी व्यक्ति की मौत सांप के काटने से होती है, तो उसका अंतिम संस्कार काशी में नहीं किया जाता। धार्मिक मान्यता है कि सांप के विष से मृत्यु के बाद भी शरीर पूरी तरह से मृत नहीं माना जाता। वैज्ञानिक दृष्टि से भी कहा जाता है कि मृत्यु के बाद 21 दिनों तक मस्तिष्क में हल्की ऑक्सीजन बची रह सकती है। यानी उस व्यक्ति के जीवित हो जाने की संभावना होती है।

इसी कारण ऐसे शव को जलाने की बजाय केले के तने में बांधकर गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। मान्यता है कि अगर वैद्य या कोई कुशल व्यक्ति मिला तो वह मृतक को जीवित कर सकता है। यह परंपरा आज भी काशी में देखने को मिलती है।


2. 12 साल से कम उम्र के बच्चों का निधन

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 12 साल से कम उम्र के बच्चे को भगवान का रूप माना जाता है। उनका हृदय और आत्मा पवित्र मानी जाती है, इसलिए उनका अंतिम संस्कार चिता पर नहीं किया जाता।

ऐसे बच्चों को विशेष विधियों से जमीन में दफनाया जाता है। इसे “बाल समाधि” कहा जाता है। यह परंपरा यह संदेश देती है कि मासूम आत्माएं सीधी भगवान की गोद में चली जाती हैं और उन्हें अग्नि को समर्पित करने की आवश्यकता नहीं होती।


3. गर्भवती महिला की मृत्यु

काशी में गर्भवती महिला का शव भी नहीं जलाया जाता। इसे धार्मिक दृष्टि से अशुभ माना जाता है। नाविकों और विद्वानों के अनुसार, गर्भवती महिला के शव को जलाने पर उसका पेट फट सकता है और गर्भस्थ शिशु बाहर आ सकता है। ऐसा होने पर बच्चा अधजला रह सकता है, जो धार्मिक दृष्टि से उचित नहीं है।

इसका एक और कारण यह भी है कि जब 12 साल से कम उम्र के बच्चे का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता, तो गर्भ में पल रहे बच्चे को भी उसी श्रेणी में रखा जाता है। गर्भवती महिला को जलाने के बजाय अन्य विधियों से अंतिम संस्कार किया जाता है।


4. संत-महात्माओं के शव

संत, महात्मा या साधु-संतों के शवों को भी काशी में नहीं जलाया जाता। इन्हें जलाना अशुभ माना गया है। चूंकि संत लोग अपने जीवन में ही सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाते हैं, इसलिए उनका शरीर पवित्र माना जाता है।

इनके शव को या तो जमीन में समाधि देकर दफनाया जाता है, जिसे “थल समाधि” कहते हैं, या फिर गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है, जिसे “जल समाधि” कहा जाता है। यह परंपरा बताती है कि संत-महात्माओं का जीवन और मृत्यु दोनों ही आम लोगों से अलग होते हैं।


5. चर्म रोग से मृत्यु

अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु चर्म रोग यानी त्वचा की गंभीर बीमारी से होती है, तो उसका अंतिम संस्कार भी काशी में नहीं किया जाता। इसे धार्मिक दृष्टि से अपवित्र माना गया है। इसके पीछे यह भी माना जाता है कि कुछ रोग शरीर के माध्यम से फैल सकते हैं, इसलिए शव को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।


काशी सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के रहस्यों को समझने का केंद्र है। यहां के श्मशान घाट हमें सिखाते हैं कि मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि आत्मा की नई यात्रा की शुरुआत है। पांच तरह के शवों को यहां अग्नि न दिए जाने की परंपरा धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक व्यवस्थाओं और वैज्ञानिक कारणों का मिश्रण है।

काशी का संदेश यही है कि हर आत्मा की अपनी यात्रा है, और मोक्ष की राह में हर मृत्यु समान नहीं होती। शायद यही कारण है कि काशी को "महाश्मशान" कहा जाता है – जहां जीवन और मृत्यु दोनों एक साथ सांस लेते हैं।

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