भुट्टे वाले चाचा की कहानी

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गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। सड़क के किनारे हल्की-हल्की बारिश की बूंदें पड़ रही थीं और हवा में मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू घुली हुई थी। अचानक मेरी नजर एक ओर पड़ी। एक अधेड़ उम्र का आदमी, फटी-सी धोती और मैला-सा कुर्ता पहने, लकड़ी के कोयलों की आँच पर भुट्टे भून रहा था। उसके चेहरे पर थकान तो थी, लेकिन मुस्कुराहट भी थी। भुट्टे की खुशबू इतनी लुभावनी थी कि कोई भी राहगीर रुक जाए और खरीदने से खुद को रोक न पाए।

मैंने गाड़ी किनारे रोक दी। सोचा, घर के लिए भुट्टे ले चलूं। तीन किलो भुट्टे पैक करवा दिए, लेकिन उस ताजी महक ने मेरे धैर्य की परीक्षा ले ली। मन नहीं माना और मैंने तुरंत कहा,
“चाचा, एक मेरे लिए भी भून दीजिए।”

चाचा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“पंद्रह रुपए का एक है।”

“भून दीजिए,” मैंने जल्दी से कहा।

जब तक चाचा भुट्टा भून रहे थे, मेरा दिमाग गणना करने लगा। ठेले पर करीब पचास भुट्टे होंगे। अगर सारे बिक जाएं, तो कितनी कमाई हो जाएगी? मेरे हिसाब से यह मामूली कारोबार नहीं था।

इसी बीच, एक लड़का रॉयल एनफील्ड पर आया। कपड़े वैसे ही साधारण और गंदे से, लेकिन हाथ में महंगा मोबाइल फोन। उसने भी बिना मोल-भाव किए भुट्टा खरीदा। मुझे जिज्ञासा हुई, तो मैंने चाचा से पूछा,
“क्या रोज़ सारा ठेला बिक जाता है?”

चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा,
“हाँ, सीजन है। आराम से बिक जाता है।”

जिज्ञासा बढ़ी तो मैंने अगला सवाल कर ही दिया,
“तो फिर और भुट्टे क्यों नहीं लाते?”

चाचा ने पास खड़े छह और ठेलों की ओर इशारा किया और मुस्कुराते हुए बोले,
“सब मेरे ही हैं।”

मैं हैरान रह गया। लगा जैसे मेरे सामने कोई रहस्य खुल गया हो। मैंने अगला सवाल किया,
“इस सीजन में कितनी कमाई हो जाती है?”

चाचा ने सहज भाव से कहा,
“गर्मी में गन्ने का जूस बेचते हैं, बरसात में भुट्टा और सर्दियों में अंडे। चार बेटे हैं, सब अपने-अपने काम पर। हम सब मिलकर महीने में लगभग तीन लाख कमा लेते हैं।”

मेरी आँखें फैल गईं। एक साधारण लगने वाले आदमी के पीछे इतनी बड़ी व्यवस्था, यह जानकर मैं चौंक गया। चाचा ने आगे बताते हुए कहा,
“पहले हमारे पास सिर्फ गन्ने के खेत थे। गन्ना शुगर मिल में औने-पौने दामों में बेचते थे। कुछ बचता नहीं था। लेकिन जब पत्नी बीमार पड़ी और बच्चों की जिम्मेदारी सिर पर आई, तो सोचा कि अब कुछ नया करना होगा। तब गन्ने का रस निकालने की मशीन खरीदी। शुरू में मुश्किलें आईं, लोगों ने मजाक भी उड़ाया, पर धीरे-धीरे काम चल निकला। अब आधा गन्ना मिल में भेजते हैं और आधे का रस निकालकर बेचते हैं।”

वह थोड़ी देर रुके और फिर बोले,
“जब गन्ने का सीजन खत्म होता है, तो भुट्टे का कारोबार शुरू कर देते हैं। मंडी ले जाने के बजाय सीधे खुद बेचते हैं। इससे मुनाफा दोगुना हो जाता है। फिर ठंडी शुरू होते ही अंडे का कारोबार करते हैं। हर बेटा मेहनत करता है, लेकिन मालिक हम ही हैं। सबको बाँटकर काम दे रखा है।”

मैं हँसते हुए बोला,
“यह तो ऑफिस जैसा सिस्टम हो गया!”

चाचा खिलखिलाकर हँसे और बोले,
“अरे बाबूजी, ऑफिस वाले यही सिस्टम हमसे चुरा ले गए!”

उनकी बात सुनकर ठेले के पीछे छिपा हुआ दर्शन मेरे सामने खुलने लगा। यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं था, बल्कि एक पूरा व्यवसाय था, जो मेहनत, अनुभव और समझदारी से खड़ा हुआ था।

मेरी जिज्ञासा यहीं खत्म नहीं हुई। मैंने उनकी पत्नी के बारे में पूछ लिया। यह सुनते ही उनकी आँखों में हल्की नमी आ गई। कुछ क्षण चुप रहने के बाद बोले,
“बीमारी में ही चली गईं। पर अगर वह बीमार न होतीं, तो शायद हम यह काम कभी शुरू नहीं करते। उसी बीमारी ने हमें नया रास्ता दिखाया। उसने हमें संपन्न बना दिया। वह आज नहीं हैं, लेकिन उनकी कमी ने हमें मजबूत बना दिया।”

उनकी बात सुनकर मैं गहरी सोच में पड़ गया। हम जैसे लोग, जो पढ़ाई-लिखाई और नौकरी की दौड़ में उलझे रहते हैं, हमेशा ‘अच्छी जिंदगी’ की तलाश में भागते रहते हैं। हमें लगता है कि सुख-सुविधाएँ और बड़े-बड़े पद ही सफलता हैं। लेकिन चाचा जैसे लोग सिखा देते हैं कि असली सुख मेहनत, आत्मनिर्भरता और परिवार के साथ मिलकर काम करने में है।

मैं भुट्टे का पहला निवाला ले रहा था और उसी के साथ यह एहसास भी कि इस साधारण से भुट्टे में कितनी गहरी जीवन-शिक्षा छिपी है। लकड़ी के कोयले पर भूनता हुआ भुट्टा सिर्फ खाने की चीज़ नहीं था, बल्कि मेहनत, संघर्ष और जीवन-दर्शन की खुशबू समेटे हुए था।

चाचा की बातों ने मेरे भीतर गहरे प्रश्न खड़े कर दिए। हमारी शिक्षा हमें बड़े सपनों की ओर तो ले जाती है, परंतु कई बार जीवन की सरल सच्चाइयों से हमें दूर कर देती है। जिस आदमी को हम सड़क किनारे ठेले पर भुट्टे बेचता हुआ देखकर साधारण समझ लेते हैं, वही असल में अपनी समझ और मेहनत से बड़ा उद्यमी होता है।

चाचा ने आख़िर में मुस्कुराकर कहा,
“बाबूजी, काम कोई छोटा नहीं होता। बस मेहनत और ईमानदारी चाहिए। हम जैसे लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं, पर जीवन ने हमें सब सिखा दिया।”

मैंने हाथ में पकड़ा भुट्टा खत्म किया और पैसे देकर वापस गाड़ी में बैठ गया। लेकिन उस दिन सिर्फ भुट्टा नहीं खरीदा, बल्कि जीवन की एक अनमोल शिक्षा साथ ले आया।

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