साल 1976 की बात है। हिंदी सिनेमा अपने सुनहरे दौर से गुजर रहा था। उसी समय स्विट्ज़रलैंड की खूबसूरत वादियों में फ़िल्म चरस की शूटिंग चल रही थी। यह फ़िल्म धर्मेंद्र और हेमा मालिनी जैसे बड़े सितारों के साथ फिल्माई जा रही थी और निर्देशन की कमान संभाल रहे थे मशहूर निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर। शूटिंग का यह सफ़र केवल एक फ़िल्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आगे चलकर भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की नींव डाल गया।
रामानंद सागर अपने पूरे परिवार के साथ स्विट्ज़रलैंड गए हुए थे। काम के बीच जब भी थोड़ा समय मिलता, वह अपने परिवार के साथ घूमते-फिरते और यूरोप की संस्कृति को समझते। एक दिन, जब शूटिंग का काम खत्म हो गया, तो उन्होंने सोचा कि परिवार के साथ आराम से कहीं बैठकर समय बिताया जाए। इसी सोच के साथ वह सभी एक कैफ़े हाउस में जा पहुँचे।
कैफ़े का माहौल सादा लेकिन सुंदर था। परिवार ने कुछ ऑर्डर किया और खाने-पीने का इंतज़ार करने लगे। सब हँसते-बोलते बातचीत कर ही रहे थे कि तभी एक वेटर उनके टेबल पर आया। वह अपने साथ एक अजीब-सा बॉक्स लेकर आया और उसे उनके सामने रख दिया। उस बॉक्स में लकड़ी के दो पल्ले लगे हुए थे। वेटर ने बड़ी निपुणता से बॉक्स खोला और उसमें लगे एक स्विच को ऑन किया। फिर बिना कुछ कहे वह वहाँ से चला गया।
परिवार ने हैरानी से उस बॉक्स को देखा। और तभी उनके सामने हुआ जादू। यह कोई साधारण बॉक्स नहीं था, बल्कि एक रंगीन टेलीविज़न था। स्क्रीन पर एक फ़िल्म चल रही थी और दृश्य रंगीन थे। उस समय भारत में रंगीन टीवी का प्रचलन नहीं था। यहाँ तक कि रामानंद सागर और उनके परिवार ने भी इससे पहले कभी रंगीन टीवी नहीं देखा था। यह अनुभव उनके लिए किसी सपने से कम नहीं था।
रामानंद सागर गहरे विचारों में डूब गए। उन्होंने बड़ी तन्मयता से उस स्क्रीन पर चलती फ़िल्म को देखा और अचानक एक निर्णय ले लिया। उन्होंने अपने परिवार से कहा—“अब मैं फ़िल्में नहीं, बल्कि टीवी सीरियल बनाऊँगा। और उस सीरियल के जरिए मैं श्रीराम की कहानी पूरी दुनिया तक पहुँचाऊँगा।” यह केवल एक विचार नहीं था, बल्कि आने वाले समय का वह बीज था, जिससे भारतीय टेलीविज़न पर रामायण जैसा भव्य वृक्ष पनपा।
प्रेम सागर, जो उस समय फ़िल्म चरस के सिनेमैटोग्राफ़र भी थे, बाद में रामायण की सिनेमैटोग्राफ़ी का दायित्व भी उन्होंने ही संभाला। सालों बाद, जब वह कपिल शर्मा के शो में पहुँचे, तो उन्होंने इस किस्से को साझा किया। उन्होंने बताया कि कैसे स्विट्ज़रलैंड की उस घटना ने उनके पिता के मन में रामायण बनाने का संकल्प जगाया।
रामानंद सागर ने इस विचार को तुरंत अमल में नहीं लाया। उन्होंने लंबे समय तक तैयारी की। रिसर्च, स्क्रिप्ट और प्रस्तुति पर गहन अध्ययन किया। 11 साल का इंतज़ार, अथक परिश्रम और गहरी आस्था के बाद आखिरकार साल 1987 की जनवरी में उनका सपना साकार हुआ। दूरदर्शन पर रामायण का प्रसारण शुरू हुआ और देखते ही देखते हर घर में राम और सीता की गाथा गूंजने लगी।
उस समय टीवी हर घर में नहीं था। जिनके पास टीवी नहीं होता था, वे पड़ोसियों के घर जाकर देखते। रविवार की सुबहें मानो ठहर जातीं। गलियों में सन्नाटा पसर जाता और लोग जल्दी-जल्दी सारे काम निपटाकर टीवी के सामने बैठ जाते। रामायण ने केवल धार्मिक कथा ही प्रस्तुत नहीं की, बल्कि पूरे समाज को एक सूत्र में बाँध दिया।
जुलाई 1988 तक रामायण का प्रसारण चला। इस दौरान इसने ऐसा करिश्मा किया, जो भारतीय टेलीविज़न के इतिहास में बेजोड़ रहा। रामायण ने दर्शकों के बीच न केवल धार्मिक आस्था को जीवित किया, बल्कि टेलीविज़न को भी घर-घर पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई। बाद में समय-समय पर कई बार इस महाकाव्य का पुनः प्रसारण किया गया और हर बार दर्शकों ने इसे उतने ही प्रेम से देखा।
रामानंद सागर का यह निर्णय दूरदर्शी था। उन्होंने समझ लिया था कि टेलीविज़न माध्यम आने वाले समय का भविष्य है। वहीं उनकी गहरी आस्था और धार्मिक संस्कारों ने उन्हें श्रीराम की कथा को जन-जन तक पहुँचाने की प्रेरणा दी। यही कारण है कि रामायण केवल एक सीरियल नहीं रहा, बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन गया।
आज जब हम उस घटना को याद करते हैं, तो यह सोचना अद्भुत लगता है कि स्विट्ज़रलैंड के एक कैफ़े हाउस में रंगीन टीवी का पहला अनुभव ही आगे चलकर भारतीय टेलीविज़न के सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रयोग की नींव बना।
इस कहानी का एक और पहलू भी है। प्रेम सागर, जो अपने पिता के साथ इस यात्रा में हमेशा खड़े रहे, आज हमारे बीच नहीं हैं। 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। लेकिन उनकी सिनेमैटोग्राफ़ी और कला का योगदान हमेशा याद किया जाएगा। चरस से लेकर रामायण तक की उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि वह केवल एक सिनेमैटोग्राफ़र नहीं थे, बल्कि दृश्य-भाषा के कुशल कलाकार थे।
रामानंद सागर और उनके परिवार ने जिस तरह मेहनत और आस्था से इस सपने को हकीकत में बदला, वह हम सबके लिए प्रेरणा है। यह कहानी हमें बताती है कि कभी-कभी एक छोटी-सी घटना, एक अनजाना अनुभव, हमारे जीवन की दिशा बदल सकता है। जैसे स्विट्ज़रलैंड का वह रंगीन टीवी रामानंद सागर के जीवन का मोड़ बन गया और भारत को रामायण जैसी अनुपम धरोहर मिल गई।
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