फिल्म ‘शोले’ भारतीय सिनेमा का वह चमकता हुआ सितारा है, जो जितनी रोमांचक और चटपटी पर्दे पर दिखाई देती है, उसकी निर्माण-यात्रा भी उससे कम दिलचस्प नहीं। पर्दे पर दर्शकों को बांध लेने वाली यह महाकाव्य फिल्म अपने निर्माण से पहले ही चर्चा का केंद्र बन चुकी थी—और इसकी सबसे बड़ी वजह थी इसकी स्टारकास्ट का चयन। कहानी लिखने से लेकर कलाकारों को चुनने तक हर कदम पर ऐसे मोड़ आए जो आज ‘शोले’ के इतिहास का हिस्सा हैं।
फिल्म की पटकथा मशहूर लेखक जोड़ी सलीम–जावेद ने लिखी थी। दिलचस्प बात यह है कि जब वे पटकथा लिख रहे थे, तब यह तय नहीं था कि कौन सा किरदार किस अभिनेता को मिलेगा। हर किरदार गढ़ा जरूर जा रहा था, लेकिन उनके कलाकारों का नाम किसी की जुबान पर नहीं था। जब स्क्रिप्ट पूरी हो गई, तब निर्देशक रमेश सिप्पी ने सबसे पहले दो दिग्गजों—संजीव कुमार और अमिताभ बच्चन—को फिल्म में लेने का फैसला किया।
लेकिन यहाँ एक ट्विस्ट था। पटकथा सुनने के बाद दोनों दिग्गज कलाकारों को फिल्म का प्रमुख नायक या दूसरा महत्वपूर्ण किरदार नहीं, बल्कि गब्बर सिंह जैसे खतरनाक खलनायक का रोल सबसे ज्यादा भा रहा था। दोनों ने अलग-अलग समय पर निर्देशक के सामने इच्छा व्यक्त की कि उन्हें गब्बर की भूमिका निभाने दी जाए। उस समय तक फिल्म में गब्बर का कोई पक्का चयन नहीं हुआ था। वह एक खुला विकल्प था, जिसे हर बड़ा कलाकार निभाना चाहता था।
रमेश सिप्पी ने मुस्कुराते हुए दोनों को साफ कर दिया कि उनकी नजर में गब्बर का चेहरा कोई और ही है। उस वक्त हिंदी फिल्मों में शीर्ष खलनायक के तौर पर डैनी डेंजोंग्पा का दबदबा था। उनकी मजबूत स्क्रीन प्रेज़ेंस और डायलॉग डिलीवरी उन्हें इस किरदार के लिए उपयुक्त बनाती थी। रमेश सिप्पी ने गब्बर का रोल डैनी को ऑफर किया और डैनी ने भी उसे बड़ी खुशी से स्वीकार कर लिया।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। कुछ समय बाद डैनी ने अपनी तारीखों की समस्या बताते हुए इस भूमिका को करने से इंकार कर दिया। यह फिल्म के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि गब्बर जैसा किरदार बहुत ही खास था। भूमिका की तलाश एक बार फिर से शुरू हुई।
इसी दौरान किसी ने अमजद खान का नाम सुझाया। अमजद खान फिल्मों में सक्रिय नहीं हुए थे, लेकिन थिएटर में वे अपनी दमदार अदाकारी के लिए जाने जाते थे। हाँ, उन्हें एक छोटी बजट की फिल्म ‘लव एंड गॉड’ मिली जरूर थी, लेकिन वह निर्माण के शुरुआती चरण में थी। अमजद ने सिप्पी साहब से मुलाकात की और उन्होंने गब्बर की भूमिका करने की हामी भर दी। किसे पता था कि उनका यह फैसला हिंदी सिनेमा में एक ऐसा किरदार जन्म देगा, जिसकी गूंज आने वाले कई दशकों तक सुनाई देती रहेगी।
अब बारी थी बसंती के चुनाव की। लेकिन यह वह किरदार था जिसके लिए director के मन में पहले से ही एक नाम दर्ज था—हेमा मालिनी। उनके चुलबुले अंदाज और स्क्रीन प्रेज़ेंस को देखकर सिप्पी साहब को विश्वास था कि बसंती के रूप में वे ही सबसे ज्यादा जंचेंगी। हेमा मालिनी ने भी खुशी-खुशी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
इसके बाद फिल्म के सबसे मनोरंजक और जोशीले किरदार—वीरू—के लिए अभिनेता की तलाश शुरू हुई। यह भूमिका ऑफर की गई धर्मेंद्र को। लेकिन पटकथा सुनने के बाद धर्मेंद्र को वीरू नहीं, बल्कि ठाकुर बलदेव सिंह का किरदार ज्यादा पसंद आया। ठाकुर का रोल एक गंभीर और प्रभावशाली भूमिका थी, जो पहले से ही संजीव कुमार को ऑफर की जा चुकी थी। धर्मेंद्र इस बात पर अड़ गए कि वे ठाकुर का रोल करना चाहते हैं।
रमेश सिप्पी ने यहाँ एक चतुराई भरा कदम उठाया। उन्होंने धर्मेंद्र से कहा कि यदि उन्हें ठाकुर का रोल दे दिया जाए, तो वीरू की भूमिका संजीव कुमार को दे दी जाएगी। यह सुनते ही धर्मेंद्र तुरंत शांत हो गए और बिना किसी विवाद के वीरू की भूमिका निभाने के लिए तैयार हो गए। क्यों? क्योंकि धर्मेंद्र उन दिनों हेमा मालिनी की मोहब्बत में थे और वे नहीं चाहते थे कि संजीव कुमार और हेमा मालिनी किसी भी तरह से ऑन-स्क्रीन जोड़ी के रूप में दिखें। उस समय इंडस्ट्री में यह भी चर्चा थी कि संजीव कुमार भी हेमा मालिनी को पसंद करते थे, इसलिए धर्मेंद्र किसी तरह यह जोड़ी बनने नहीं देना चाहते थे।
धर्मेंद्र के फाइनल होते ही फिल्म की स्टारकास्ट पूरी हो गई और फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। फिल्म के हर कलाकार ने अपनी भूमिका में जान डाल दी। चाहे जय–वीरू की दोस्ती हो, बसंती का चुलबुला अंदाज हो, ठाकुर की गंभीरता हो या गब्बर का खतरनाक और डरावना व्यक्तित्व—हर किरदार अपने आप में एक लेजेंड बन गया।
आज भी ‘शोले’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की एक विरासत है। इसकी निर्माण-यात्रा, उसके किस्से, और उसके कलाकारों की पसंद-नापसंद सब मिलकर इसे और भी रोचक बना देते हैं। ‘शोले’ की कहानी जितनी प्रभावी है, उसकी बनने की कहानी भी उतनी ही रोमांचक और यादगार है।
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